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रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता से मिट्टी की सेहत को खतरा: BBSSL चेयरमेन

योगेंद्र कुमार ने जैविक खाद के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इसके बिना सतत कृषि की कल्पना अधूरी है

Published: 16:24pm, 15 Jan 2026

भारतीय बीज सहकारी समिति के अध्यक्ष एवं इफको (IFFCO) के मार्केटिंग डायरेक्टर योगेंद्र कुमार ने कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि मिट्टी की सेहत की रक्षा और जैविक व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिए बिना दीर्घकालिक कृषि स्थिरता संभव नहीं है।

योगेंद्र कुमार पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) द्वारा आयोजित सतत कृषि पर कार्यशाला के तहत बुधवार को आयोजित एक सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस सत्र में नीति निर्माताओं, सहकारी संगठनों के प्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों ने पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार खेती से जुड़ी चुनौतियों और समाधानों पर विचार-विमर्श किया। इफको के वरिष्ठ अधिकारी तरुण भार्गव और संजय कुलश्रेष्ठ भी पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुए।

अपने संबोधन में योगेंद्र कुमार ने कहा कि वास्तविक स्थिरता मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में निहित है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने किसानों और हितधारकों से चार दशक पहले की खेती की पद्धतियों पर पुनर्विचार करने का आह्वान किया, जब कम रासायनिक इनपुट के साथ भी उच्च उत्पादकता हासिल की जाती थी।

उन्होंने चेतावनी दी कि “आज यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता से अल्पकालिक आय तो बढ़ सकती है, लेकिन यह धीरे-धीरे मिट्टी की सेहत को खराब कर रही है और भूमि की दीर्घकालिक उत्पादकता को कम कर रही है।”

योगेंद्र कुमार ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से न केवल मिट्टी की संरचना और सूक्ष्मजीव गतिविधि प्रभावित होती है, बल्कि जल गुणवत्ता और पारिस्थितिक संतुलन पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि मिट्टी की सेहत को बहाल करना खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय स्थिरता और पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

इफको की पहलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि संस्था द्वारा शुरू किया गया ‘सेव द सॉयल’ अभियान देश के विभिन्न राज्यों में किसानों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया प्राप्त कर रहा है। इस अभियान का उद्देश्य वैज्ञानिक मिट्टी परीक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और संतुलित उर्वरक उपयोग के साथ-साथ जैव-उर्वरक, हरी खाद और जैविक इनपुट्स को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि मिट्टी परीक्षण से किसान फसलों और भूमि की वास्तविक जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का उपयोग कर सकते हैं, जिससे अनावश्यक खर्च में कमी आती है।

योगेंद्र कुमार ने जैविक खाद के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इसके बिना सतत कृषि की कल्पना अधूरी है। जैविक खाद मिट्टी की संरचना को मजबूत करती है, जल धारण क्षमता बढ़ाती है और सूक्ष्मजीव गतिविधि को प्रोत्साहित करती है, जो दीर्घकालिक उत्पादकता के लिए आवश्यक है।

उन्होंने हरियाणा के कुछ क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां किसान तेजी से जैविक खेती, फसल विविधीकरण और बेहतर फसल चक्र पद्धतियों को अपना रहे हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।

उन्होंने नैनो उर्वरकों की भूमिका को भी रेखांकित करते हुए कहा कि नैनो यूरिया और नैनो डीएपी पारंपरिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने में सहायक हैं और पोषक तत्वों की प्रभावी आपूर्ति सुनिश्चित करते हुए मिट्टी की सेहत की रक्षा करते हैं।

अपने समापन वक्तव्य में योगेंद्र कुमार ने प्रतिभागियों से पर्यावरण संतुलन में योगदान देने के लिए अपने घरों में कम से कम पांच पेड़ लगाने की अपील की। उन्होंने आंवला, बेल, नीम और नींबू जैसे पौधों को लगाने की सलाह दी, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ घरेलू पोषण और जैव विविधता को भी बढ़ावा देते हैं।

इस सत्र में सहकारी संस्थाओं की भूमिका और जिम्मेदार इनपुट प्रबंधन को देश के लिए सतत एवं मजबूत कृषि भविष्य की आधारशिला बताया गया।

Diksha

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