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दो दशक बाद शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने पर RBI ने शुरू की सार्वजनिक चर्चा

प्रस्ताव के अनुसार पात्र सहकारी क्रेडिट सोसायटियों के पास कम से कम 300 करोड़ रुपये की पूंजी, न्यूनतम 10 वर्षों का संचालन अनुभव, मजबूत और निरंतर वित्तीय प्रदर्शन, 12 प्रतिशत या उससे अधिक का सीआरएआर

Published: 14:06pm, 14 Jan 2026

दो दशकों से अधिक के अंतराल के बाद भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) को नए लाइसेंस जारी करने की संभावनाओं पर औपचारिक सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया शुरू की है। मंगलवार को RBI ने इस विषय पर एक विस्तृत डिस्कशन पेपर जारी किया। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के उदारीकरण दौर में क्षेत्र में आई वित्तीय अस्थिरता के बाद वर्ष 2004 से नए UCB लाइसेंस पर रोक लगी हुई थी।

डिस्कशन पेपर में RBI ने स्पष्ट किया है कि यदि भविष्य में लाइसेंसिंग दोबारा शुरू की जाती है, तो यह प्रक्रिया बेहद सतर्क और चयनात्मक होगी। केंद्रीय बैंक का संकेत है कि शुरुआत में बड़े, मजबूत और सुशासित सहकारी क्रेडिट सोसायटियों को ही लाइसेंस देने पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि अतीत में छोटे संस्थानों में अधिक कमजोरियां देखी गई थीं।

प्रस्ताव के अनुसार पात्र सहकारी क्रेडिट सोसायटियों के पास कम से कम

  • 300 करोड़ रुपये की पूंजी,
  • न्यूनतम 10 वर्षों का संचालन अनुभव,
  • मजबूत और निरंतर वित्तीय प्रदर्शन,
  • 12 प्रतिशत या उससे अधिक का सीआरएआर,
  • और लाइसेंस के समय शुद्ध एनपीए 3 प्रतिशत से कम होना आवश्यक होगा।

RBI ने यह भी संकेत दिया है कि बहु-राज्य सहकारी समितियों या व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं को प्राथमिकता दी जा सकती है ताकि विविधीकरण, स्थिरता और दीर्घकालिक मजबूती सुनिश्चित की जा सके।

डिस्कशन पेपर में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सहकारी ढांचे के बावजूद UCBs के लिए शासन मानक वाणिज्यिक बैंकों के समान होने चाहिए। इसके लिए राज्य सहकारी सोसायटी अधिनियमों और बहु-राज्य सहकारी सोसायटी अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि पेशेवर बोर्ड, स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति और शेयरहोल्डिंग पर कड़ा नियंत्रण संभव हो सके।

RBI ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि 1993 से 2001 के बीच 823 UCB लाइसेंस जारी किए गए थे, जिनमें से करीब 31 प्रतिशत बाद में वित्तीय रूप से कमजोर हो गए। इन्हीं कारणों से 2004 में यह निर्णय लिया गया था कि जब तक UCBs के लिए एक मजबूत कानूनी और नियामकीय ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक नए लाइसेंस नहीं दिए जाएंगे।

डिस्कशन पेपर में यह भी कहा गया है कि पिछले 20 वर्षों में UCBs का परिचालन वातावरण काफी बदल चुका है। बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिससे RBI को UCBs पर अधिक सशक्त निगरानी और शासन अधिकार मिले और उन्हें वाणिज्यिक बैंकों के नियामकीय ढांचे के करीब लाया गया। इसके बाद जमा राशि के आधार पर UCBs को चार स्तरों में बांटने वाला टियर आधारित नियामकीय ढांचा भी लागू किया गया।

RBI ने यह भी रेखांकित किया कि विलय और समेकन से क्षेत्र की स्थिरता में सुधार हुआ है। वर्ष 2003 में जहां UCBs की संख्या 2,100 से अधिक थी, वहीं 31 मार्च 2025 तक यह घटकर 1,457 रह गई। 2020 के बाद जिन 57 दिवालिया UCBs के लाइसेंस रद्द किए गए, वे सभी टियर-1 से टियर-3 श्रेणी के थे, जिससे छोटे बैंकों की कमजोरियां अब भी उजागर होती हैं।

हालांकि समग्र वित्तीय स्थिति में सुधार देखा गया है—जहां 31 मार्च 2025 तक UCBs की जमा राशि 5.84 लाख करोड़ रुपये, कुल परिसंपत्तियां 7.38 लाख करोड़ रुपये और शुद्ध एनपीए मात्र 0.7 प्रतिशत रहे—फिर भी RBI ने शासन संबंधी कमियों, पूंजी की कमी, तकनीकी पिछड़ेपन और साइबर सुरक्षा जोखिमों पर चिंता जताई है। वर्तमान में 82 UCBs अब भी निगरानी प्रतिबंधों के दायरे में हैं।

RBI ने सभी हितधारकों से अपने ‘कनेक्ट टू रेगुलेट’ पोर्टल के माध्यम से सुझाव और टिप्पणियां आमंत्रित की हैं। प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर आगे शहरी सहकारी बैंकों के लाइसेंसिंग पर मसौदा दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं। सुझाव भेजने की अंतिम तिथि 13 फरवरी 2026 तय की गई है।

Diksha

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