भारत का सहकारी क्षेत्र अपने इतिहास के सबसे व्यापक आधुनिकीकरण अभियान से गुजर रहा है, और इस परिवर्तन की धुरी बनकर उभरा है दक्षिण भारत—विशेष रूप से तमिलनाडु। संसद में केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह द्वारा दिए गए बयान और प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि सरकार की बहुआयामी रणनीति से प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को मजबूत करने का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है।
नेशनल कोऑपरेटिव डेटाबेस (NCD) के अनुसार, तमिलनाडु देश में PACS की कार्यक्षमता के मामले में शीर्ष पर है। राज्य के 4,532 PACS में से 4,529 सक्रिय हैं, जिससे इसकी कार्यक्षमता 99.93% हो जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर 1,10,850 PACS में से 1,06,090 कार्यरत हैं। दक्षिणी राज्यों में कुल 13,500 से अधिक PACS हैं- कर्नाटक (6,318), आंध्र प्रदेश (2,058), तमिलनाडु (4,532), तेलंगाना (909) और केरल (1,709) जो 95% से अधिक कार्यक्षमता के साथ एक मजबूत सहकारी ढांचा बनाते हैं।
सरकार द्वारा तैयार मॉडल उपनियमों ने PACS को 25 से अधिक विविध गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति दी है। इनमें PM-किसान समृद्धि केंद्र, जनऔषधि केंद्र, कॉमन सर्विस सेंटर, एलपीजी वितरण, भंडारण प्रबंधन और विभिन्न प्रसंस्करण इकाइयाँ शामिल हैं, जिनसे ग्रामीण सेवाओं और रोजगार में वृद्धि हो रही है।
इस सुधार का केंद्रीय स्तंभ है 2022 में शुरू की गई PACS कंप्यूटरीकरण की केंद्रीय क्षेत्र परियोजना। शुरुआत में 63,000 PACS को शामिल किया गया था, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 79,630 तक पहुँच गई है। ₹2,925.39 करोड़ की संशोधित लागत वाली यह परियोजना सभी PACS को ERP आधारित सॉफ़्टवेयर से जोड़कर राज्य सहकारी बैंकों, जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और नाबार्ड से एकीकृत करने का लक्ष्य रखती है।
डिजिटल अपनाने में दक्षिण भारत अग्रणी है। तमिलनाडु में 4,522 PACS ERP पर ऑनबोर्ड किए जा चुके हैं और 4,524 PACS लाइव होकर दैनिक प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं। कर्नाटक ने 3,981, आंध्र प्रदेश ने 2,019 PACS को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर स्थानांतरित किया है। केरल और तेलंगाना भी लगातार प्रगति कर रहे हैं।
वित्तीय सहायता के मामले में भी दक्षिणी राज्यों की स्थिति मजबूत है। तमिलनाडु को PACS कंप्यूटरीकरण के लिए पिछले चार वर्षों में 51.73 करोड़ रुपये मिले हैं, जिससे वह शीर्ष दस राज्यों में शामिल हो गया है।
31 मार्च 2027 तक कंप्यूटरीकरण पूरा करने के लक्ष्य के साथ, यह अभियान देश के सहकारी ढांचे में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में एक निर्णायक कदम है, जिसमें दक्षिण भारत प्रमुख भूमिका निभा रहा है।


