राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) द्वारा कराए गए ग्रामीण आर्थिक स्थिति एवं मत सर्वेक्षण (RECSS) ने ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक एवं मजबूत परिवर्तन के संकेत दिए हैं। यह सर्वेक्षण, जो प्रत्येक दो माह में आयोजित किया जाता है, ग्रामीण परिवारों की आय, उपभोग, निवेश, ऋण व्यवस्था, मुद्रास्फीति की धारणा तथा भविष्य की अपेक्षाओं का समयानुकूल विश्लेषण प्रस्तुत करता है। नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक वर्ष में ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में उल्लेखनीय मजबूती दर्ज की गई है, जो देश की समग्र आर्थिक प्रगति का सशक्त आधार बन रही है।
सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण परिवारों की आय में वृद्धि, उपभोग क्षमता में तेजी, निवेश में उत्साहजनक उछाल तथा महंगाई को लेकर चिंता में भारी कमी देखने को मिली है। यह सभी संकेतक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता और मजबूती को दर्शाते हैं।
उपभोग में 80% परिवारों की वृद्धि, खरीद क्षमता में सुधार
RECSS के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 80 प्रतिशत परिवारों ने पिछले वर्ष उपभोग में वृद्धि दर्ज की है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण परिवार अपनी मासिक आय का औसतन 67.3 प्रतिशत भाग उपभोग पर खर्च कर रहे हैं, जो सर्वेक्षण आरंभ होने के बाद से सर्वाधिक स्तर है। नाबार्ड का कहना है कि मांग में यह बढ़ोतरी किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी आर्थिक वर्गों में समान रूप से देखी गई है।
आय बढ़ी, भविष्य के प्रति आत्मविश्वास मजबूत
सर्वेक्षण में शामिल परिवारों में से 42.2 प्रतिशत ने बताया कि उनकी आय में पिछले वर्ष वृद्धि हुई है, जबकि केवल 15.7 प्रतिशत ने आय में गिरावट दर्ज की। आय में गिरावट का यह स्तर सर्वेक्षण के इतिहास का न्यूनतम स्तर है। आगे की संभावनाओं को लेकर ग्रामीण परिवारों का विश्वास और बढ़ा है और लगभग 76 प्रतिशत लोग मानते हैं कि आगामी वर्ष में उनकी आय और अधिक बढ़ेगी।
ग्रामीण निवेश में तेज़ उछाल
नाबार्ड के आंकड़ों के अनुसार 29.3 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने कृषि एवं गैर-कृषि क्षेत्रों में अपने पूंजी निवेश में बढ़ोतरी की है। यह निवेश मजबूरी या ऋण संकट के कारण नहीं, बल्कि आय और उपभोग की बेहतर स्थिति के कारण हुआ है, जो ग्रामीण बाजार की सक्रियता का स्पष्ट संकेत है।
औपचारिक ऋण स्रोतों पर भरोसा बढ़ा
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि ग्रामीण परिवारों में से 58.3 प्रतिशत अब केवल औपचारिक स्रोतों बैंक और संस्थागत क्रेडिट से ही ऋण ले रहे हैं, जो सितंबर 2024 में 48.7 प्रतिशत था। हालांकि, सर्वेक्षण संकेत करता है कि लगभग 20 प्रतिशत परिवार अभी भी अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं, जिसे कम करने की दिशा में और सुधार की आवश्यकता है।
सरकारी सहायता ने मजबूत किया ग्रामीण मांग का आधार
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण परिवारों की औसत मासिक आय का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा सरकारी सब्सिडी और सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से पूरा होता है। खाद्यान्न, गैस, उर्वरक, शिक्षा, पेंशन और बिजली जैसी आवश्यक सेवाओं पर यह सहायता खर्च होती है। कुछ परिवारों में यह हिस्सा 20 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जिससे ग्रामीण मांग स्थिर बनी रहती है और न्यूनतम आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
महंगाई की धारणा घटी, उम्मीदें मजबूत
सर्वेक्षण में ग्रामीण भारत की महंगाई से संबंधित धारणा घटकर 3.77 प्रतिशत पर आ गई है, जो पिछले एक वर्ष का सबसे निम्न स्तर है। लगभग 84 प्रतिशत ग्रामीण परिवार मानते हैं कि आने वाले महीनों में महंगाई 5 प्रतिशत या उससे नीचे रहेगी।
अवसंरचना और बुनियादी सेवाओं में सुधार
ग्रामीण परिवारों ने सड़क, शिक्षा, पेयजल, स्वास्थ्य और बिजली जैसी सेवाओं की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। इन सुधारों ने ग्रामीण आय और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूती प्रदान की है।
RECSS सर्वेक्षण क्या है?
नाबार्ड द्वारा प्रत्येक दो माह में किए जाने वाला यह राष्ट्रीय सर्वेक्षण ग्रामीण आय, उपभोग, निवेश, ऋण, मुद्रास्फीति और भविष्य की अपेक्षाओं का वास्तविक आकलन करता है। इसका उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदलती परिस्थितियों की समयबद्ध और तथ्यात्मक विश्लेषण उपलब्ध कराना है।


