कोलंबो में हुए 17वें ICA-AP क्षेत्रीय अधिवेशन में “सहकारी पूंजी की समस्या का समाधान मजबूत वित्तपोषण के साथ” विषय पर एक महत्वपूर्ण और गहन चर्चा हुई। एशिया-प्रशांत क्षेत्र के विशेषज्ञों ने सहकारी पूंजी को मजबूत बनाने के लिए कई नए विचार साझा किए, जिससे यह सत्र कार्यक्रम का सबसे प्रभावशाली और ज्ञानवर्धक हिस्सा साबित हुआ।
इस सत्र की अध्यक्षता ICA-AP के क्षेत्रीय निदेशक श्री बालासुब्रमणियन अय्यर ने की। इस सत्र में सहकारी क्षेत्र की बदलती वित्तीय जरूरतों को समझने और उनका समाधान निकालने के लिए अनेक विशेषज्ञ मौजूद थे।
इस अवसर पर भारत के वरिष्ठ सहकारी विशेषज्ञ सतीश मराठे ने “भारत में सहकारिताओं द्वारा पूंजी और दीर्घकालिक निधि जुटाने के साधन” विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने भारत के कानूनी और नियामक ढांचे को समझाया, साथ ही दीर्घकालिक निधि जुटाने की चुनौतियों और लोकतांत्रिक सदस्य नियंत्रण बनाए रखने की बात कही। उन्होंने विश्व के सफल सहकारी मॉडलों का भी उदाहरण दिया, जिनमें मिश्रित पूंजी संरचनाएं अपनाई गई हैं।
मराठे ने भारत में पूंजी जुटाने के वर्तमान साधनों जैसे सदस्य शेयर पूंजी, सांविधिक रिजर्व, NABARD और NCDC के फंडिंग चैनल, SIDBI व आवासीय वित्त संस्थानों की सहायता, दीर्घकालिक उधार, फिक्स्ड डिपॉजिट, रेकर्सिंग डिपॉजिट आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने भारत की सहकारी पूंजी व्यवस्था में मौजूद प्रमुख कमजोरियों को भी उजागर किया और सुधार के कई सुझाव दिए। इनमें गैर-मताधिकार शेयर की अनुमति, सहकारी बांड जारी करना, भागीदारी आधारित इक्विटी अपनाना, AT1 और Tier-2 जैसी हाइब्रिड पूंजी उपकरण विकसित करना और दीर्घकालिक इक्विटी सहायता के लिए राष्ट्रीय सहकारी निवेश कोष बनाना शामिल हैं।
मराठे ने डिजिटल MIS सिस्टम, मजबूत जोखिम प्रबंधन, शासन सुधार और संरचित रिजर्व के माध्यम से क्षमता निर्माण की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारत का सहकारी क्षेत्र एक ऐतिहासिक मोड़ पर है, जहाँ सहकारिता मंत्रालय और NABARD, NCDC जैसी संस्थाएं अभूतपूर्व अवसर प्रदान कर रही हैं।”
सत्र में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों जैसे सोलिडैरिडाड नेटवर्क की अनीता मुनासिंघे और प्रोफेसर सिडसेल ग्रिमस्टाड ने भी सहकारी वित्तपोषण, सामाजिक प्रभाव निवेश और जलवायु से जुड़ी वित्तीय रणनीतियों पर अपने अनुभव साझा किए।
अंत में, यह निष्कर्ष निकाला गया कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सहकारिताओं को टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी और समावेशी बने रहने के लिए नवाचारी वित्तपोषण मॉडल अपनाने और नीति सुधारों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।


