प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में आयोजित साउथ इंडिया नेचुरल फार्मिंग समिट 2025 में देशभर के किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती भारतीय कृषि परंपरा में निहित है और यह आने वाले वर्षों में देश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगी।
प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम के दौरान पीएम-किसान सम्मान निधि की 21वीं किस्त जारी करते हुए ₹18,000 करोड़ राशि देश के 9 करोड़ किसानों के बैंक खातों में सीधे हस्तांतरित की। उन्होंने बताया कि अब तक छोटे किसानों के खातों में ₹4 लाख करोड़ से अधिक राशि DBT माध्यम से भेजी जा चुकी है, जो किसानों के सशक्तिकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाता है।
स्वदेशी मॉडल, विज्ञान आधारित दृष्टिकोण की जरूरत
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्राकृतिक खेती भारतीय ज्ञान, परंपरा और आधुनिक विज्ञान का संगम है। उन्होंने “वन एकड़, वन सीजन” मॉडल के तहत किसानों से शुरुआत करने की अपील करते हुए कहा कि कृषि संस्थानों और वैज्ञानिकों को इसे वैज्ञानिक आधार पर मजबूत आंदोलन के रूप में विकसित करना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दक्षिण भारत की कृषि परंपराएं वैश्विक स्तर पर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। तमिलनाडु में प्रचलित पंचगव्य, जीवामृत, बीजामृत, मुल्चिंग, बाजरा-आधारित खेती और बहु-स्तरीय कृषि प्रणाली को उन्होंने प्राकृतिक खेती का आधार बताया। उन्होंने दक्षिण भारत को “कृषि का जीवंत विश्वविद्यालय” कहते हुए जल संरक्षण के प्राचीन मॉडल, पारंपरिक फसल पद्धतियों और वेस्टर्न घाट्स की जैव विविधता को प्राकृतिक खेती के लिए प्रेरणादायी बताया।
मिट्टी की सेहत, उत्पादन लागत और किसान आय में सुधार
प्रधानमंत्री ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, नमी कम हो रही है और लागत बढ़ रही है। प्राकृतिक खेती इन समस्याओं का प्रभावी समाधान है। इसके माध्यम से:
-
मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है
-
उत्पादन लागत घटती है
-
फसल रसायनमुक्त और सुरक्षित होती है
-
जैव विविधता संरक्षित होती है
उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में 35,000 हेक्टेयर भूमि पहले से प्राकृतिक और जैविक खेती के अंतर्गत लाई जा चुकी है।
दक्षिण भारत की विरासत बनेगी प्रेरणा
प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जल प्रबंधन तंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां 13वीं शताब्दी की कलिंगरायन नहर, प्राचीन बांध और मंदिर टैंक जल संरक्षण के अनोखे मॉडल हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती और जल प्रबंधन को इन उदाहरणों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने पारंपरिक मिलेट्स कम्बू, सामई, रागी, साज्जा और जोन्ना की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर श्री अन्न को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है और प्राकृतिक खेती इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
किसानों के खेत बनेंगे ‘जीवंत प्रयोगशाला’
प्रधानमंत्री ने कहा कि वैज्ञानिक समुदाय को प्राकृतिक खेती को कृषि शिक्षा का हिस्सा बनाना चाहिए। किसानों के खेत “जीवंत प्रयोगशाला” बनें जहां अनुसंधान और प्रयोग सीधे खेत स्तर पर किए जाएं।
उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा स्थापित 10,000 FPOs, किसानों को सफाई, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और ई-नाम जैसे ऑनलाइन बाजारों से जोड़कर उनके उत्पादों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने में सहायक बनेंगे।
NMNF: राष्ट्रीय मिशन के रूप में विस्तार
केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग (NMNF) शुरू किया था, जिसके तहत प्राकृतिक खेती को मिशन मोड में बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए ₹2,481 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया है।
आने वाले दो वर्षों में:
-
1 करोड़ किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा
-
10,000 जैविक इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किए जाएंगे
शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF)
प्रधानमंत्री ने विशेषज्ञ सुभाष पालेकर द्वारा प्रस्तावित ZBNF मॉडल को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह चार आधार स्तंभों जैवामृत, बीजामृत, मुल्चिंग और वाफसा पर आधारित है। इस पद्धति में अग्नास्त्र, ब्रह्मास्त्र और नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, जो किसानों की लागत को लगभग समाप्त कर देते हैं।


