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चीनी सहकारी समितियाँ: मौसम और कीमतों की अस्थिरता से नए गन्ना पेराई सत्र की धीमी शुरुआत

परंपरागत रूप से पेराई सत्र की शुरुआत 1 अक्टूबर को मानी जाती है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बारिश जारी रहने से खेत जलभराव की स्थिति में रहे और कटाई में देरी हुई

Published: 14:58pm, 18 Nov 2025

राष्ट्रीय सहकारी चीनी महासंघ (एनसीएसएफ) ने एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया है कि भारत का गन्ना पेराई सत्र 2025-26 इस वर्ष देरी से शुरू हुआ है। इसका मुख्य कारण रहा अनियमित मानसून, कुछ क्षेत्रों में अक्टूबर–नवंबर तक जारी रहने वाली असामान्य “वापसी वर्षा” और गन्ने के मूल्य को लेकर चल रहा आंदोलन।

परंपरागत रूप से पेराई सत्र की शुरुआत 1 अक्टूबर को मानी जाती है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बारिश जारी रहने से खेत जलभराव की स्थिति में रहे और कटाई में देरी हुई। मराठवाड़ा क्षेत्र में सोयाबीन, ज्वार, मक्का, दालों और बागवानी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। गन्ने की फसल अपेक्षाकृत लचीली होते हुए भी कटाई परिस्थितियों के अनुकूल न होने के कारण खेतों में अटकी रही।

गन्ने के मूल्य आंदोलन के चलते महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने की आवाजाही भी प्रभावित हुई, जिससे पेराई और चीनी उत्पादन दोनों में देरी देखी गई।

इसके बावजूद नवंबर के मध्य तक इस सत्र की प्रगति पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर रही है। इस अवधि तक 325 चीनी मिलें चालू हो चुकी हैं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या केवल 144 थी। इस बार अब तक 128 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई हुई है, जो पिछले वर्ष के 91 लाख मीट्रिक टन से काफी अधिक है। चीनी उत्पादन भी 7.10 लाख मीट्रिक टन की तुलना में बढ़कर 10.50 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है, और औसत चीनी रिकवरी दर 7.8% से बढ़कर 8.2% हो गई है।

उद्योग अनुमानों के अनुसार, 2025-26 में सकल चीनी उत्पादन लगभग 350 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है। इसमें महाराष्ट्र का योगदान 125 लाख मीट्रिक टन, उत्तर प्रदेश का 110 लाख मीट्रिक टन और कर्नाटक का 70 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। इथेनॉल उत्पादन के लिए 35 लाख मीट्रिक टन चीनी के उपयोग और 290 लाख मीट्रिक टन घरेलू खपत को ध्यान में रखते हुए, भारत के पास इस वर्ष 20–25 लाख मीट्रिक टन तक निर्यात योग्य अधिशेष उपलब्ध रहेगा।

सरकार पहले ही 15 लाख मीट्रिक टन निर्यात की अनुमति दे चुकी है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि जनवरी–अप्रैल 2026 की निर्यात अवधि में अतिरिक्त 10 लाख मीट्रिक टन निर्यात अवसर भी प्राप्त हो सकते हैं, जो बाजार में स्थिरता लाएगा।

एनसीएसएफ ने बताया कि चीनी के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और इथेनॉल खरीद दरें कई वर्षों से अपरिवर्तित रहने के कारण मिलें वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। इससे गन्ना बकाया भुगतान और परिचालन प्रबंधन प्रभावित होते हैं। महासंघ ने मांग की है कि किसानों और मिलों दोनों के हितों को संतुलित करते हुए एमएसपी और इथेनॉल दरों में बढ़ोतरी की जाए।

एनसीएसएफ के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटिल ने किसानों से नई एआई-आधारित कृषि तकनीकों को अपनाने की अपील की। पायलट परियोजनाओं में एआई से उपज में 40% वृद्धि और लागत में 30% कमी दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि देश 55–57 लाख हेक्टेयर गन्ना क्षेत्र और 75–77 टन प्रति हेक्टेयर की उपज के साथ विश्व के प्रमुख चीनी उत्पादकों में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

महासंघ के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने तीन प्राथमिकताओं पर जोर दिया-एमएसपी में बढ़ोतरी, चीनी-आधारित इथेनॉल की कीमतों में संशोधन और भविष्य में चीनी से इथेनॉल आवंटन में वृद्धि।

Diksha

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