केंद्र सरकार ने दालों की बढ़ती मांग और आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण योजना शुरू की है। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने “मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज़” के तहत अगले छह वर्षों में अरहर (तूर), उड़द और मसूर की 15 जीनोम-एडिटेड किस्में विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस मिशन की ऑपरेशनल गाइडलाइंस 18 अक्टूबर को जारी की गईं, जिनमें अनुसंधान, विकास और उत्पादन के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार किया गया है।
ज्यादा उत्पादन और जलवायु सहनशीलता होगी मिशन की प्राथमिकता
मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, इस मिशन का मुख्य उद्देश्य दालों की ऐसी किस्में तैयार करना है जो अधिक उपज देने वाली, कम अवधि में पकने वाली, और जलवायु परिवर्तन व कीट प्रकोप से निपटने में सक्षम हों। जीनोम एडिटिंग और हाइब्रिड तकनीक के संयोजन से इन किस्मों को विकसित किया जाएगा ताकि उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके।
निश्चित समयसीमा में जारी होंगी नई किस्में
कृषि मंत्रालय ने इन किस्मों को जारी करने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय की है। योजना के अनुसार,
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2028-2029 के दौरान अरहर, उड़द और मसूर की 6 जीनोम-एडिटेड किस्में (प्रत्येक की दो-दो) जारी की जाएंगी।
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2030-2031 में 9 नई किस्में (प्रत्येक की तीन-तीन) विकसित कर किसानों के लिए उपलब्ध कराई जाएंगी।
इस कार्य के लिए आईसीएआर (ICAR) और उससे संबद्ध कृषि अनुसंधान संस्थानों को विशेष निधि और तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी।
दाल उत्पादन में 45% वृद्धि का लक्ष्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 11 अक्तूबर को लॉन्च किए गए इस मिशन पर सरकार ₹11,440 करोड़ का निवेश कर रही है। इसका उद्देश्य 2025-26 से 2030-31 के बीच देश में कुल दाल उत्पादन को 242 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 350 लाख मीट्रिक टन करना है। साथ ही, औसत उपज को 881 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 1130 किलो प्रति हेक्टेयर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
क्लाइमेट रेज़िलिएंट खेती की दिशा में कदम
सरकार का यह मिशन न केवल आत्मनिर्भरता की ओर कदम है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और कीटों से प्रभावित फसलों की चुनौतियों से निपटने के लिए भी दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करता है। देश के प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में फील्ड ट्रायल्स के माध्यम से इन किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने की योजना भी बनाई जा रही है।


