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आदिवासी जन, जंगल, जमीन व हॉकी से दिल से जुड़े शख्स थे ओलंपियन जयपाल सिंह मुंडा

भारत के पहले हॉकी ओलंपिक कप्तान जयपाल सिंह मुंडा न केवल एक महान खिलाड़ी थे, बल्कि आदिवासी समाज की आवाज भी थे। हॉकी इंडिया ने भारतीय हॉकी के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इस महान शख्सियत को याद किया, जिन्होंने देश और आदिवासी समुदाय दोनों को गर्व का कारण दिया।

Published: 06:09am, 10 Oct 2025

मौजूदा पीढ़ी जब भारतीय हॉकी के इतिहास के पन्नों पर नजर डालेगी तो उसे यह जरूर पढ़ने को मिलेगा कि सर्वकालीन महानतम हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी से भारत ने आजादी से पहले 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजेल्स) और 1936 के ओलंपिक में अंग्रेजों की उपेक्षा को दरकिनार कर खिताब की सुनहरी हैट्रिक पूरी की।

बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि भारत के आजाद होने से पहले 1928 में एम्सटर्डम ओलंपिक में शिरकत कर उसे स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम की कप्तानी बेहतरीन फुलबैक रहे जयपाल सिंह मुंडा को सौंपी गई थी, लेकिन एंग्लो-इंडियन खिलाड़ियों के विद्रोह के चलते उन्होंने फाइनल से पहले ही टीम की कप्तानी छोड़ दी थी। विद्रोही हॉकी खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा को 1928 के ओलंपिक में कप्तानी दिए जाने का खासतौर पर एंग्लो-इंडियन खिलाड़ियों ने एरिक पेनिगर की अगुआई में विरोध किया था।

उस समय भारतीय टीम के मैनेजर रॉजर भी पेनिगर के साथ हो गए और इसके चलते जयपाल सिंह फाइनल में नहीं खेले। तब भारत ने पेनिगर की अगुआई में नीदरलैंड को 1928 ओलंपिक के फाइनल में 3-0 से हराकर पहली बार स्वर्ण पदक जीता था। भारत में आदिवासी जन, जंगल, जमीन व हॉकी से दिल से जुड़े शख्स थे ओलंपियन जयपाल सिंह मुंडा। हॉकी इंडिया ने बीते मंगलवार से एक महीने का अभियान शुरू किया है, जो 7 नवंबर 2025 को भारतीय हॉकी के 100 वर्ष पूरे होने के शताब्दी समारोह तक चलेगा। इसी मौके पर हॉकी इंडिया ने महान आदिवासी खिलाड़ी जयपाल सिंह मुंडा को याद किया।

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म रांची (अब झारखंड) जिले के खूंटी सब डिवीजन पाहन टोली गांव में एक मुंडा (आदिवासी) परिवार में प्रमोद पाहन के रूप में हुआ था। तब रांची जिला तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेंसी में आता था। आदिवासियों को हॉकी में सबसे पहले पहचान जयपाल सिंह मुंडा ने ही दिलाई और उन्हें भारत के सर्वकालीन महानतम आदिवासी हॉकी खिलाड़ी के रूप में याद किया जाएगा। सच तो यह है कि आदिवासी खिलाड़ियों के भारतीय हॉकी में बतौर फुलबैक समृद्ध इतिहास के पहले सबसे कामयाब फुलबैक जयपाल सिंह मुंडा थे। उनकी बतौर फुलबैक विरासत को माइकल किंडो, दिलीप तिर्की, लाजरस बारला और अब अमित रोहिदास शान से आगे बढ़ा रहे हैं।

जयपाल सिंह मुंडा बहुमुखी प्रतिभा के धनी और मनमौजी थे, लेकिन अपनी बात को तर्क के साथ कहने के साथ अपने प्रतिद्वंद्वी को उसे मानने के लिए मजबूर कर देते थे। जयपाल सिंह मुंडा अपने जमाने के कामयाब हॉकी खिलाड़ी, जमाने के साथ चलने वाले शिक्षक और बुलंद इरादों के साथ अपनी बात कहने वाले देशभक्त थे। वे आदिवासियों के हितों के लिए हमेशा अपनी आवाज उठाते रहे। जयपाल सिंह मुंडा का नाम भारत की महान हॉकी शख्सियतों के रूप में हमेशा अमर रहेगा।

भारत में हर एक कोस पर बोली बदल जाती है, खान-पान बदल जाता है। आजादी से पहले आदिवासियों और वहाँ की जनजातियों की अपनी परंपराएँ और रीति-रिवाज थे और आज भी हैं। इनको लेकर आजादी से पहले कई तरह की भ्रांतियाँ भी थीं। दरअसल, आत्मरक्षा के लिए हथियार रखने और उनका बेवजह इस्तेमाल करने में बहुत फर्क है। कोई भी व्यक्ति महज हथियार रखने से आतंकी नहीं हो जाता। 1946 में संविधान सभा में जयपाल सिंह ने हथियार अधिनियम की एक व्यवस्था का तब आदिवासियों के खिलाफ बेहद निष्ठुर ढंग से इस्तेमाल करने का मसला उठाया था।

देश की आजादी से पहले 1946 में खुद संविधान सभा में चुने जाने पर जब जयपाल सिंह ने कहा, ‘मुझे अपने ‘जंगली’ होने पर गर्व है,’ तो सभी को यह साफ हो गया था कि इंग्लैंड में काफी वक्त गुजारने के बावजूद उनके दिल में अपने जंगल और हर आदिवासी के लिए दर्द छिपा था। जयपाल सिंह खुद मुंडा थे और बिरसा मुंडा के जीवन दर्शन से खासे प्रभावित रहे। जयपाल सिंह का परिवार भी अन्य आदिवासियों की तरह ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आया और उन्होंने भी ईसाई धर्म अपना लिया। उन्होंने रांची में मिशनरियों के सेंट पॉल स्कूल में शिक्षा ली। सेंट पॉल के प्रिंसिपल ने ही उन्हें उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड भेजा और बहुत जल्द ही वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शीर्ष हॉकी खिलाड़ी बन गए।

YuvaSahakar Desk

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