भारत का सहकारी बैंकिंग क्षेत्र लगातार दबाव में है। डिपॉज़िट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 17 बैंकों का पंजीकरण रद्द किया गया, जिनमें से 15 सहकारी बैंक और 2 वाणिज्यिक बैंक शामिल हैं। वहीं इस अवधि में केवल दो नए बैंक पंजीकृत हुए – दमन और दीव स्टेट कोऑपरेटिव बैंक तथा एक विदेशी बैंक।
आंध्र प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक कई राज्यों के सहकारी बैंकों ने अपनी DICGC सदस्यता खो दी। महाराष्ट्र में ही पाँच बैंकों का पंजीकरण रद्द किया गया। परिणामस्वरूप, 31 मार्च 2025 तक पंजीकृत बैंकों की कुल संख्या घटकर 1,982 रह गई, जो पिछले वर्ष 1,997 थी। गौरतलब है कि 2001 में यह संख्या अपने उच्चतम स्तर 2,728 पर थी।
हालाँकि संख्या में गिरावट हो रही है, लेकिन सहकारी बैंक अभी भी भारत के वित्तीय समावेशन नेटवर्क का अहम हिस्सा बने हुए हैं। मौजूदा 1,982 पंजीकृत संस्थानों में से 1,843 (93%) सहकारी बैंक हैं, जिनमें 1,458 शहरी सहकारी बैंक (UCBs), 34 राज्य सहकारी बैंक और 352 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक शामिल हैं। इसके विपरीत वाणिज्यिक बैंकों की संख्या मात्र 139 है, जिनमें अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और लोकल एरिया बैंक शामिल हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि सहकारी बैंकों में जमा बीमा कवरेज वाणिज्यिक बैंकों से अधिक मज़बूत है, जिससे छोटे जमाकर्ताओं को बेहतर सुरक्षा मिलती है। सहकारी बैंकों का बीमित जमा अनुपात 63.1% है, जो वाणिज्यिक बैंकों के 41.5% से काफ़ी अधिक है। इसी तरह सहकारी बैंकों के 98.3% खाते पूर्णतः सुरक्षित हैं, जबकि वाणिज्यिक बैंकों में यह आँकड़ा 97.6% है।
डीआईसीजीसी बैंकों से जमा बीमा के लिए सालाना 0.12% का फ्लैट प्रीमियम वसूलता है। वित्त वर्ष 2024-25 में इस मद से 26,764 करोड़ रुपये का प्रीमियम प्राप्त हुआ, जो वर्ष-दर-वर्ष 12.1% की वृद्धि दर्शाता है। इसी अवधि में निगम द्वारा 476 करोड़ रुपये के दावे निपटाए गए।


