दिल्ली की जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-VI ने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को सेवा में कमी का दोषी पाते हुए शिकायतकर्ताओं को इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति, मुआवजा और मुकदमेबाजी खर्च का भुगतान करने का निर्देश दिया है। आयोग ने कहा है कि LIC को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित को इलाज का पूरा खर्च 7% वार्षिक ब्याज सहित लौटाए।
साथ ही आयोग ने एलआईसी को ₹50,000 का मुआवजा और ₹50,000 मुकदमा खर्च के रूप में देने का भी आदेश सुनाया है। यह आदेश आयोग की अध्यक्ष श्रीमती पूनम चौधरी एवं सदस्य श्री शेखर चंद्र की पीठ ने दिनांक 5 मई 2025 को पारित किया। मामला रोहिणी निवासी धर्वेंद्र कुमार और उनकी पत्नी अनीता द्वारा दायर शिकायत से संबंधित है। शिकायतकर्ता ने एलआईसी और टीपीए कंपनी मेडसेवा हेल्थकेयर लिमिटेड के विरुद्ध चिकित्सा खर्च के क्लेम को गलत तरीके से नकारने का आरोप लगाया था।
शिकायत के अनुसार, वर्ष 2008 में धर्वेंद्र कुमार ने एलआईसी की ‘हेल्थ प्लस’ नामक पॉलिसी ली थी, जिसकी अवधि 29 वर्ष थी और इसमें ₹2 लाख तक का मेडिकल रिस्क कवर था। वर्ष 2011 में उनकी पत्नी अनीता को गंभीर पीठ दर्द के कारण स्पाइनल सर्जरी करानी पड़ी, जिसका खर्च ₹1,08,445 आया।
जब उन्होंने यह राशि क्लेम की, तो एलआईसी ने केवल ₹2,300 की स्वीकृति दी और यह तर्क दिया कि पॉलिसी केवल गैर-आईसीयू हॉस्पिटलाइज़ेशन के लिए भुगतान करती है, और यह सर्जरी अनुमोदित सर्जरी की सूची में नहीं आती।
आयोग ने एलआईसी के इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि बीमा कंपनी यह प्रमाणित नहीं कर सकी कि उसने बीमा पॉलिसी बेचते समय ग्राहकों को पॉलिसी की सभी शर्तें एवं अनुमोदित बीमारियों की सूची स्पष्ट रूप से प्रदान की थी। आयोग ने उच्चतम न्यायालय के “मॉडर्न इंसुलेटर लिमिटेड बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस” फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बीमा कंपनी पर यह जिम्मेदारी है कि वह सभी शर्तें ग्राहकों को समझाए।
इस आधार पर आयोग ने एलआईसी को आदेश दिया कि वह ₹1,08,445 की राशि 7% वार्षिक ब्याज सहित लौटाए और ₹50,000 का मानसिक क्षतिपूर्ति मुआवजा तथा ₹50,000 मुकदमा व्यय भी शिकायतकर्ता को प्रदान करे।


