यौन अपराध को केवल यौन इच्छा, मानसिक बीमारी या क्षणिक आवेग का परिणाम मान लेना समस्या को बहुत सरल बना देना है। मनोचिकित्सकों और व्यवहार विशेषज्ञों के अनुसार, कई मामलों में गुस्सा, शत्रुता, सहानुभूति की कमी, महिलाओं के प्रति अधिकार की भावना, विकृत सोच और आत्मनियंत्रण की कमजोरी जैसे कई कारक मिलकर हिंसक व्यवहार का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
आस्था कुंज सामूहिक दुष्कर्म मामले के बाद यौन अपराधों के पीछे की मानसिकता पर चर्चा एक बार फिर तेज हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि हर आरोपी की सामाजिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि अलग होती है, इसलिए किसी एक कारण से हर अपराध की व्याख्या नहीं की जा सकती।
बचपन के अनुभव छोड़ सकते हैं गहरा असर
एम्स नई दिल्ली के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर द्वारा यौन अपराध के आरोपी 40 पुरुषों पर किए गए एक अध्ययन में करीब 75 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बचपन में कम से कम एक प्रतिकूल अनुभव होने की बात कही। अध्ययन में गुस्सा और शत्रुता का स्तर भी प्रमुखता से सामने आया।
हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि बचपन में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने वाला हर व्यक्ति अपराधी नहीं बनता। ऐसे अनुभव तभी अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जब उनके साथ आक्रामकता, सामाजिक अलगाव, विकृत मान्यताएं, कमजोर भावनात्मक नियंत्रण या सहानुभूति की कमी जैसे दूसरे कारक भी जुड़ जाएं।
सहमति और सीमाओं की समझ सबसे अहम
स्वस्थ संबंधों की बुनियाद आपसी सहमति, सम्मान और भरोसे पर होती है। कुछ यौन अपराधियों में समस्या यह देखी जाती है कि वे सामने वाले व्यक्ति की इच्छा, असहमति और व्यक्तिगत सीमाओं को पर्याप्त महत्व नहीं देते। नियंत्रण या दबाव को वे संबंध का सामान्य हिस्सा समझ सकते हैं। गुस्सा और शत्रुता जुड़ने पर ऐसी सोच हिंसक रूप ले सकती है।
बदलता समाज भी बढ़ा रहा चुनौती
इहबास के पूर्व निदेशक डॉ. निमेष जी देसाई के अनुसार, तेजी से शहरीकरण, गांव से शहर की ओर पलायन, सामाजिक बदलाव, यौन कुंठा, कानून के प्रति कमजोर भय और डिजिटल तथा सोशल मीडिया से प्रभावित व्यवहार भी कुछ मामलों में जोखिमकारी परिस्थितियां बना सकते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी कारण अपराध को उचित नहीं ठहराता।
हर अपराधी मानसिक रोगी नहीं
विशेषज्ञ सबसे महत्वपूर्ण भ्रम यह मानते हैं कि यौन अपराध करने वाला हर व्यक्ति मानसिक रोगी होता है। वास्तविकता में मानसिक बीमारी कुछ मामलों में मौजूद हो सकती है, लेकिन यौन हिंसा को केवल मानसिक रोग से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
यौन अपराधों की रोकथाम के लिए केवल कठोर सजा ही पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। किशोरों और युवाओं को सहमति, महिलाओं के सम्मान, स्वस्थ संबंधों, गुस्से पर नियंत्रण और भावनात्मक जिम्मेदारी की शिक्षा देना जरूरी है। इसके साथ तेज न्याय प्रक्रिया, प्रभावी कानून व्यवस्था और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।यौन हिंसा की रोकथाम का रास्ता अपराध के बाद कार्रवाई से ही नहीं, बल्कि उस सोच और व्यवहार को समय रहते पहचानने से भी गुजरता है जो हिंसा की जमीन तैयार कर सकता है।


