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अक्टूबर–दिसंबर 2025 में घटी बेरोजगारी दर, ग्रामीण भारत में 4%, शहरी में 6.7% रही

ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय श्रम बाजार सुधार की राह पर अग्रसर है। बेरोजगारी दर में कमी, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एवं स्वरोजगार में वृद्धि से अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। हालांकि, संगठित क्षेत्र में रोजगार सृजन को बढ़ावा देने, कौशल विकास को मजबूत करने एवं क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए सरकार निरंतर प्रयासरत है।

Published: 15:38pm, 11 Feb 2026

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी त्रैमासिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के ताजा आंकड़ों ने भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) और श्रम बाजार के लिए सकारात्मक संकेत दिए हैं। सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों के प्रभाव से बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जो देश के आर्थिक पुनरुत्थान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी तिमाही आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर-दिसंबर 2025 की तिमाही में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसरों में सुधार हुआ है, जिससे श्रम बाजार में स्थिरता और विस्तार के संकेत मिल रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार

एनएसओ के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर जुलाई–सितंबर 2025 की तिमाही के 4.4 प्रतिशत से घटकर अक्टूबर–दिसंबर 2025 में 4 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट ग्रामीण पुरुषों और महिलाओं दोनों वर्गों में रोजगार के अवसर बढ़ने के कारण संभव हुई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि और स्वरोजगार आधारित गतिविधियों की सक्रियता ने रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार करने वाले व्यक्तियों का अनुपात भी बढ़कर 63.2 प्रतिशत हो गया है, जो पिछली तिमाही में 62.8 प्रतिशत था। यह प्रवृत्ति ग्रामीण उद्यमिता और स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों के विस्तार को दर्शाती है।

शहरी क्षेत्रों में भी सुधार

शहरी क्षेत्रों में भी बेरोजगारी दर में मामूली किंतु सकारात्मक गिरावट दर्ज की गई है। अक्टूबर–दिसंबर 2025 में शहरी बेरोजगारी दर 6.9 प्रतिशत से घटकर 6.7 प्रतिशत हो गई है। इस सुधार में मुख्य योगदान शहरी पुरुषों की बेरोजगारी दर में कमी का रहा, जो 6.2 प्रतिशत से घटकर 5.9 प्रतिशत पर आ गई है।

हालांकि शहरी क्षेत्रों में रोजगार की संरचना ग्रामीण क्षेत्रों से भिन्न है, फिर भी तृतीयक क्षेत्र (सेवा क्षेत्र) का दबदबा कायम है, जहां इस तिमाही में 61.9 प्रतिशत श्रमिक कार्यरत रहे। इससे संकेत मिलता है कि शहरी अर्थव्यवस्था में सेवा आधारित गतिविधियां रोजगार का प्रमुख स्रोत बनी हुई हैं।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

इस तिमाही की रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला श्रम बल सहभागिता दर (एलएफपीआर) में वृद्धि है। समग्र श्रम बल सहभागिता दर अक्टूबर–दिसंबर 2025 में बढ़कर 55.8 प्रतिशत हो गई, जो पिछली तिमाही में 55.1 प्रतिशत थी।

विशेष रूप से 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए श्रम बल सहभागिता दर 33.7 प्रतिशत से बढ़कर 34.9 प्रतिशत हो गई है। यह संकेत करता है कि महिलाएं बड़ी संख्या में रोजगार या रोजगार की तलाश की प्रक्रिया से जुड़ रही हैं। महिला भागीदारी में यह वृद्धि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

श्रमिक जनसंख्या अनुपात में वृद्धि

रोजगार की स्थिति का एक अन्य महत्वपूर्ण सूचक श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) है। जुलाई–सितंबर 2025 में यह 52.2 प्रतिशत था, जो अक्टूबर–दिसंबर 2025 में बढ़कर 53.1 प्रतिशत हो गया है। बेरोजगारी दर में कमी और डब्ल्यूपीआर में वृद्धि से स्पष्ट होता है कि अर्थव्यवस्था में कार्यरत व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के जनसंख्या अनुमानों के आधार पर एनएसओ ने कुल कार्यरत व्यक्तियों की संख्या का भी आकलन किया है। जुलाई–सितंबर 2025 में जहां औसतन 56.2 करोड़ लोग कार्यरत थे, वहीं अक्टूबर–दिसंबर 2025 में यह संख्या बढ़कर 57.4 करोड़ हो गई। इनमें 40.2 करोड़ पुरुष और 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। यह वृद्धि समग्र रोजगार परिदृश्य में सुधार को दर्शाती है।

कृषि और स्वरोजगार की भूमिका

ग्रामीण रोजगार में कृषि क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका बनी हुई है। अक्टूबर–दिसंबर 2025 में ग्रामीण क्षेत्रों में 58.5 प्रतिशत श्रमिक कृषि क्षेत्र से जुड़े रहे, जो पिछली तिमाही के 57.7 प्रतिशत से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि कृषि अब भी ग्रामीण आजीविका का प्रमुख आधार बनी हुई है।

इसके साथ ही स्वरोजगार की ओर बढ़ती प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि लोग पारंपरिक नौकरियों के अतिरिक्त स्वयं के उद्यम स्थापित करने की दिशा में भी अग्रसर हो रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मत है कि दीर्घकालिक संतुलित विकास के लिए संगठित क्षेत्र में भी रोजगार सृजन की गति को और तेज करने की आवश्यकता है।

YuvaSahakar Desk