नई दिल्ली के हरियाणा भवन में PWIF (Policy Watch India Foundation) द्वारा आयोजित एक नीति संवाद कार्यक्रम में नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) को लेकर पत्रकारों, श्रमिक संगठनों, अर्थशास्त्रियों और उद्योग विशेषज्ञों के बीच विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में श्रम सुधारों को ऐतिहासिक कदम बताते हुए जहां उनका स्वागत किया गया, वहीं फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट, महिलाओं की कार्यस्थल सुरक्षा और सेल्फ-रेगुलेशन जैसे मुद्दों पर गंभीर चिंताएं भी सामने आईं।
पैनल में प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं भाजपा के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल, भारतीय मजदूर संघ से कैलाश चंद्र शर्मा, द हिंदू बिजनेसलाइन के वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक शिशिर सिन्हा, तथा नौकरी डॉट कॉम की संस्थापक सदस्यों में से एक श्रीमती वी. एन. सरोजा शामिल थीं।
कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और अर्थशास्त्री गोपालकृष्ण अग्रवाल ने कहा कि लेबर कोड भारत की दीर्घकालिक आर्थिक सुधार प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि इन सुधारों का उद्देश्य केवल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती देना और असंगठित श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है। उन्होंने ई-श्रम कार्ड को श्रमिकों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बताया और MSME सेक्टर को मजबूत करने पर जोर दिया।
इसके बाद वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सिन्हा ने कहा कि किसी कानून का समर्थन करते हुए उस पर सवाल उठाना गलत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रम सुधारों को ऐतिहासिक बताने के साथ-साथ यह पूछना भी जरूरी है कि महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल कैसे सुनिश्चित किया जाएगा और फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट में कर्मचारियों की सुरक्षा कैसे होगी।
फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट पर चिंता
शिशिर सिन्हा ने फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट की परिभाषा को भ्रामक बताते हुए कहा कि कॉन्ट्रैक्ट रिन्यूअल में सब्जेक्टिविटी का खतरा बना रहता है। उन्होंने आशंका जताई कि कई मामलों में नियोक्ता पांच साल पूरे होने से पहले ही कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर ग्रेच्युटी जैसे वैधानिक लाभों से कर्मचारियों को वंचित कर सकते हैं। उन्होंने मांग की कि नियमों में फिक्स्ड टर्म की स्पष्ट परिभाषा और प्रदर्शन के ठोस, मापनीय मानक तय किए जाएं।
श्रमिक संगठनों का पक्ष
भारतीय मजदूर संघ के प्रदेश मंत्री (राजस्थान) और राजस्थान राज्य कर्मचारी महासंघ के प्रभारी कैलाश चंद्र शर्मा ने कहा कि पहले मौजूद 29 श्रम कानूनों को चार लेबर कोड में समाहित करना एक जरूरी सुधार है। उन्होंने बताया कि 2015 से 2019 के बीच सरकार, नियोक्ता और श्रमिक संगठनों के साथ त्रिपक्षीय प्रक्रिया के तहत कई दौर की बातचीत हुई।
उन्होंने कहा कि वेतन संहिता और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रावधान श्रमिक हित में हैं, लेकिन इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड और ओएसएच कोड में महिलाओं की सुरक्षा और रोजगार की स्थिरता को लेकर और स्पष्टता की आवश्यकता है।
कानूनी पक्ष पर अधिवक्ता अतुल कुमार शर्मा की राय
कार्यक्रम में एडवोकेट अतुल कुमार शर्मा ने श्रम संहिताओं के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कानून में प्रावधान होना और उनका प्रभावी क्रियान्वयन होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने कहा कि यदि महिलाओं की नाइट शिफ्ट, कार्यस्थल सुरक्षा या अन्य प्रावधानों का पालन नहीं होता, तो शिकायत निवारण की स्वतंत्र और प्रभावी व्यवस्था बेहद जरूरी है। नौकरी जाने के डर के कारण यदि श्रमिक शिकायत नहीं कर पाते, तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल
चर्चा के दौरान महिलाओं की नाइट शिफ्ट, सुरक्षित परिवहन, सुरक्षा गार्ड और क्रेच सुविधा जैसे प्रावधानों का स्वागत किया गया, लेकिन वक्ताओं ने सवाल उठाया कि नियमों का पालन न होने की स्थिति में शिकायत की प्रभावी व्यवस्था क्या होगी। नौकरी की असुरक्षा महिला श्रमिकों के लिए आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
वर्कर सेफ्टी और MSME सेक्टर
सेफ इंडिया फाउंडेशन की सीनियर एडवाइजर बी.एन. सरोजा ने कहा कि ओएसएच कोड में वर्कर सेफ्टी से जुड़े प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन असली चुनौती उनका जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन है। उन्होंने कहा कि MSME सेक्टर में जिम्मेदार व्यवसाय संस्कृति विकसित किए बिना केवल कानून पर्याप्त नहीं होंगे।


